शुक्रवार, 29 जून 2007
नेताजी के साथ कंपस का राउंड
बीए सेकेंड इयर में पहुंचा, तब तक मुझे युनिवर्सिटी के सीनेट हाल के सामने वाले बरगद की हवा लग चुकी थी....जब युनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स लीडर्स को देखता, कि उनके पीछे १५-२० लौंडे चिलांडु की तरह घूमते. नेता जी सफेद कुर्ता पहने खसखसी दाड़ी रखे...ऐसे लगते थे जैसे संसद के सत्र में भाग लेने जा रहे हैं. ...वो कंपस का राउंड मारते तो तो उन्हें देखकर सारी लड़कियां खुशर-फुसर करने लगतीं....ये देखकर मैं सोचने लगता कि यार अच्छी भौकाली लाइफ है...कुछ दिन मैंने भी उनके साथ कंपस के राउंड मारे, सोचा कि शायद अपना भी कुछ हो जाय..रोज-रोज लड़कों के साथ सरस्वती घाट जाने में मजा नहीं आता था, क्योंकि वहां जाकर रोज एक ही काम रहता था कपल्स को देखकर फ्रश्टेशन में उनके ऊपर कमेंट्स पास करना..., पर नेताजी भाइयों के साथ घूमने से कोई फायदा नहीं हुआ...लड़कियां जो कभी-कभी बात कर लेती थीं वो कटने लगीं...हां भाई लोंगो से दोस्ती करके ये फायदा जरूर हुआ कि पेपर आउट करवाना, एडमिशन करवाना जैसे काम करवा करके सिगरेट और बियर का खर्च निकाल लेना................continuएड.
गुरुवार, 28 जून 2007
कॉलेज में राजनीति
दिनेश जी........ने स्टूडेंट्स इलेक्शन का जिक्र करके सोते शेर पर कंकड़ मार दिया है....मतलब मुझे भी इलाहाबाद युनिवॆसिटी के इलेक्शन वाले दिन याद दिला दिए हैं....इलाहाबाद में एक यहां की युनिवॆसिटी के अलावा यमुना के किनारे वाले यूईंग क्रिश्चिचयन कॉलेज का भी बड़ा नाम था, खासकर पढ़ाई के मामले में. जब ग्रेजुएशन में एडिमशन लेने जा रहा तो पिताश्री ने समझाया कि बेटे क्रिश्चिचयन कॉलेज में एडिमशन ले लो, पर मैंने उन्हें युनिवॆसिटी में एडिमशन के लिए कंविंस कर लिया......खैर..जब एडिमशन लेने जा रहे थे, तो पापा जी साथ ही थे. जैसे ही काउंटर के पास पहंचे, तो लंबी लाइन लगी थी...उपर से गर्मी भी फाड़ू थी. ..मैं लाइन में लग गया..वह भी पास ही खड़े थे. .तब तक काउंटर पर दो तीन दाड़ी वाले भाई साहब आए और बिना लाइन में लगे ही अपने कैंडीडेट का एडिम॥शन करवा दिया...टु बी कंटीन्यूड
स्वागत के ही साथ विदा की तैयारी
सौरभ जी ने कई बार अनुरोध किया कि कैंपस में कुछ लिखें, हालांकि मुझे लगता है कि शायद कैंपस से जुड़ी मेरी यादों में शायद किसी की खास दिलचस्पी न हो.
बहरहाल, जहां तक मैं पीछे पलटकर देखता हूं तो कैंपस में पहुंचते सबसे पहले जिस बात से मेरा पाला पड़ा वह थी पालिटिक्स... गोरखपुर का वह डिग्री कालेज दरअसल पालिटिक्स की पाठशाला ज्यादा थी. स्वभाव से अंतरमुखी होने के बावजूद हमेशा मेरी दोस्ती वाचाल किस्म के लोगों के होती आई. तो देखते-देखते कुछ इस तरह के दोस्तो से पाला पड़ गया जो दरअसल तकनीकी एजुकेशन हासिल कर रहे थे, मगर डिग्री के लिए वहां एडमीशन ले रखा था. वे स्टूडेंट पालीटिक्स में खासी दिलचस्पी रखते थे, कुछ ने तो बाकायदा इलाहाबाद और बनारस में इसकी जैसे ट्रेनिंग ही ले रखी थी. कुछ ही महीनों बाद चुनाव शुरू हो गए. हमारे साथियों ने एक कैंडीडेट खड़ा कर रखा था.
देखते-देखते कालेज कैंपस का सारा माहौल इलेक्शनमय हो गया. राजनीति का जादू इस कदर हमारे दिमाग पर छाया कि उसके सिवा कुछ और समझ में ही नहीं आता था. नारों से परिसर गूंजने लगे. घर-घर जाकर स्टूडेंट्स को अपने फेवर में तैयार करना और हाथ से पोस्टर तैयार करना. हमारे खिलाफ जो कैंडीडेट था वह बाहुबली था.. यानी धन भी और बल भी. इलेक्शन से तीन दिन पहले उसके चेहरे वाले पोस्टर से कालेज, बगल के गल्सॆ हास्टल की सारी दीवारें पट गईं. यहां तक कि बीच सड़क पर भी पोस्टर चिपका दिए गए थे. उसी दौरान सनी की फिल्म अर्जुन देखी, (वैसे वह पहले ही रिलीज हो चुकी थी) जहां चौगले (अनुपम खेर) के चेहरे वाले पोस्टर सारे शहर में चिपके दिखते हैं, तो लगता था कि हम भी कोई इसी तरह की लड़ाई लड़ रहे हैं.
बहरहाल हमारे कैंडीडेट को हारना था, वह हार गया. मगर हमारी मेहनत के वोट उसे मिले और राकी के स्टैलोन की तरह वह हारकर भी जीत गया. यह तो था ग्रेजुएशन के पहले साल का किस्सा.... अगले दो साल लंबी बैठकों और बहसों में कटे. मधुर स्मृतियों वाले कैंपस के दिन बाद में शुरू हुए. तब तक हम काफी मैच्योर हो चुके थे और बच्चन के शब्दों में स्वागत के ही साथ विदा की तैयारी होने लगी थी. दोस्ती गहरी होने से पहले ट्रेन की सीटी बज चुकी थी...
कभी मन में ख्याल आता है कि तमाम दोस्त जाने कहां होंगे, कैसे होंगे... क्या कभी खाली वक्त में बीत दिनों को याद करते होंगे..
मेरी तरह.......
दिनेश श्रीनेत
बहरहाल, जहां तक मैं पीछे पलटकर देखता हूं तो कैंपस में पहुंचते सबसे पहले जिस बात से मेरा पाला पड़ा वह थी पालिटिक्स... गोरखपुर का वह डिग्री कालेज दरअसल पालिटिक्स की पाठशाला ज्यादा थी. स्वभाव से अंतरमुखी होने के बावजूद हमेशा मेरी दोस्ती वाचाल किस्म के लोगों के होती आई. तो देखते-देखते कुछ इस तरह के दोस्तो से पाला पड़ गया जो दरअसल तकनीकी एजुकेशन हासिल कर रहे थे, मगर डिग्री के लिए वहां एडमीशन ले रखा था. वे स्टूडेंट पालीटिक्स में खासी दिलचस्पी रखते थे, कुछ ने तो बाकायदा इलाहाबाद और बनारस में इसकी जैसे ट्रेनिंग ही ले रखी थी. कुछ ही महीनों बाद चुनाव शुरू हो गए. हमारे साथियों ने एक कैंडीडेट खड़ा कर रखा था.
देखते-देखते कालेज कैंपस का सारा माहौल इलेक्शनमय हो गया. राजनीति का जादू इस कदर हमारे दिमाग पर छाया कि उसके सिवा कुछ और समझ में ही नहीं आता था. नारों से परिसर गूंजने लगे. घर-घर जाकर स्टूडेंट्स को अपने फेवर में तैयार करना और हाथ से पोस्टर तैयार करना. हमारे खिलाफ जो कैंडीडेट था वह बाहुबली था.. यानी धन भी और बल भी. इलेक्शन से तीन दिन पहले उसके चेहरे वाले पोस्टर से कालेज, बगल के गल्सॆ हास्टल की सारी दीवारें पट गईं. यहां तक कि बीच सड़क पर भी पोस्टर चिपका दिए गए थे. उसी दौरान सनी की फिल्म अर्जुन देखी, (वैसे वह पहले ही रिलीज हो चुकी थी) जहां चौगले (अनुपम खेर) के चेहरे वाले पोस्टर सारे शहर में चिपके दिखते हैं, तो लगता था कि हम भी कोई इसी तरह की लड़ाई लड़ रहे हैं.
बहरहाल हमारे कैंडीडेट को हारना था, वह हार गया. मगर हमारी मेहनत के वोट उसे मिले और राकी के स्टैलोन की तरह वह हारकर भी जीत गया. यह तो था ग्रेजुएशन के पहले साल का किस्सा.... अगले दो साल लंबी बैठकों और बहसों में कटे. मधुर स्मृतियों वाले कैंपस के दिन बाद में शुरू हुए. तब तक हम काफी मैच्योर हो चुके थे और बच्चन के शब्दों में स्वागत के ही साथ विदा की तैयारी होने लगी थी. दोस्ती गहरी होने से पहले ट्रेन की सीटी बज चुकी थी...
कभी मन में ख्याल आता है कि तमाम दोस्त जाने कहां होंगे, कैसे होंगे... क्या कभी खाली वक्त में बीत दिनों को याद करते होंगे..
मेरी तरह.......
दिनेश श्रीनेत
हाँ ये वो ही कवि सचिन हैं
सचिन भाई शुक्रिया, मैंने तो कानपुर में भी कई बार ऐसा करने की कोशिश कि थी, लेकिन आपने मौका ही नही दिया। कभी राजधानी में बैठें तो जम कर सुनूँगा और परहुंगा भी। वैसे आप ब्लोग पढ़ते रहें और लिखते रहें, इसमे आपको मेरी ही नही कैम्पस से जुडे सभी सहयोगियों के पन्ने पढने को मिलेंगे। प्रभात खबर के कुंदन पूछ रहे थें कि ये सचिन वही रांची वाला है क्या। मैंने उन्हें बता दिया कि हाँ ये वो ही कवि सचिन हैं। मेरे कवि सचिन कुछ कवितायेँ पोस्ट कर दें।
सचिन said...
सौरव भाई आप तो ऐसे ना थे । यार ये क्या बात हुई सिर्फ एड देकर चलते बने । कभी डायरी के कुछ पन्ने पढवा भी दो । ये कुछ उसी तरह हैं कि हलवाई कहे कि भाई बहुत बढिया मिठाई बनी हैं, शानदार आइटम हैं और भी तारीफ की जाये और जब सुनने वाले का मुह रसमलाई हो जाये तो दुकान बंद कर दे । अरे भईया पट खोलो और जरा चखाओ कि क्या माल हैं।
सचिन said...
सौरव भाई आप तो ऐसे ना थे । यार ये क्या बात हुई सिर्फ एड देकर चलते बने । कभी डायरी के कुछ पन्ने पढवा भी दो । ये कुछ उसी तरह हैं कि हलवाई कहे कि भाई बहुत बढिया मिठाई बनी हैं, शानदार आइटम हैं और भी तारीफ की जाये और जब सुनने वाले का मुह रसमलाई हो जाये तो दुकान बंद कर दे । अरे भईया पट खोलो और जरा चखाओ कि क्या माल हैं।
मंगलवार, 26 जून 2007
कुछ यादें हमारे साथ
क्लास ८ में था। अचानक मेरे दिमाग मे ना जाने कहॉ से diary लिखने kee बात आयी। मैंने अपनी दाएरी में पुराने गाने और शायरी लिखना शुरू किया। फिर मुझे लगा कि क्यों ना मैं इस diary में लोगों के कोमेंत भी लूं। और फिर ये भी शूरू हो गया। आज ये diary पुरी तरह भर चुकी है, जिसमे केंपस के कई साथियों के कोमेंत भी शामिल हैं। १९९७ में मैं देल्ही आ गया था। नए शहर में तनहाई के दिनों में इस diary ने मेरा जितना साथ निभाया, वो मेरे लिए अनमोल था। आज भी कभी अगर उदास होता हूँ या मन फिर से कैम्पस कि तरफ जता है, तो वो diary पढने बैठ जाता हूँ। उसके एक-एक पन्ने पेर जैसे कहानी लिखी हो, ऐसी कहानी जिसे बार-बार पढना अच्चा लगता है। उसी तरह कैम्पस भी आप सभी को वापस कैम्पस की ज़िन्दगी जीने का एक मौका देता है। यकीं मानिये इस व्यस्त ज़िन्दगी में भी अगर कैम्पस लाइफ के एक पन्ने खोलेंगे तो कई पन्नों कि दास्ताँ खुद-ब-खुद लिखने का मन करेगा। कैम्पस लाइफ है ही ऐसी. आपने गौर किया होगा जब कैम्पस के दोस्त मिलते हैं, तो कैम्पस कि कितनी बातें याद आने लगती हैं। तो कुछ यादें हमारे साथ भी शेएर करें, हम सब ko कैम्पस का मित्र मानते हुए।
बिना लड़कियों ke लाइफ पार्ट-2
हाँ तो मैं कह रह था कि युनिवर्सिटी की लड़कियों के चाल चलन को देखकर मेरे अन्दर के अरविंद ने कहा कि बिडू राहुल और चिन्टू की तरह रहने से कोई घास नही डालने वाला नही है....अब इनके दिन लड़ गए हैं..अब इमेज बदलकर वापस ८० के दशक के विजय (अमिताभ बच्चन ) बन जाओ....लड़कियों से अपनी तरफ से बात मत करो....क्लास में क्रन्तिकारी बाते करो...जिस रस्ते से वो जाती हैं, उसी रस्ते की किसी चाय की दुकान के मेम्बेर्शिप लेकर अपना जयादा समय वही गुजरो .........जैसे ही लडकियां गुज़रे चाय सुडकने के साथ सिगरेट का शुट्टा मारो.......शाम होते ही बियर कि दुकान पर रोज़ हाजरी लगाओ....साथ में उन चिन्टू और बिल्लू टाईप के लड़को को ले जाओ, जो लड़कियों से चिपके रहते हैं ... इससे फायदा ये होगा कि वो क्लास कि लड़कियों के हमारे अन्ग्री यंग मैन के किस्से सुनायेंगे....भाई लोगो अपुन ने इस तरह के ढेरों नुश्खे अज्माये गए पर साला पता नही किस दुर्वाषा ऋषि का श्राप लगा था। बात बन ही नही रही थी। हारकर बजरंग बलि के भक्त बन गए .......और मन को संतोष दिलाया कि हम किसी से कम तो है नही फिर किसी के पीछे क्यों जाये....फिर सोचा पापा का अच्छा बेटा बन जाया जाये..फिर तत्काल ही युनिवर्सिटी के प्रोफसर ॐ प्रकाश मालवीय के घर पर चलने वाली एन्लिश की क्लास ज्वाइन कर ली, पर इस समय तक सिगरेट के धुँए और बियर रुपी कोल्ड ड्रिंक के अच्छे दोस्त बन चुके थे । क्लास ज्वाइन किये हुए कुछ ही दिन हुई थे कि एक लडकी जो बुर्के में थी कि थी...शायद उसका पहला दिन था, उसने मुझसे कहा कि मुझे नोट्स दे दो ...इनता सुनते ही मेरे अन्दर जोर का करंट लगा...फिर धीरे -धीरे हम अच्छे दोस्त हो गए....और हमेशा की तरह जिस तरह से दोस्ती प्यार में बदल जाती वैसा ही हुआ। कुछ समय बाद भाई कि ये हालत हो गयी कि बाकी लड़के मुझसे जलकर कहते साला बिल्कुल चिन्टू टाईप का लड़का है....हमेशा लड़कियों से चिपका रहता है। मैंने सोचा यार बेकार कि इमेज बदला ..........??
अरविंद मिश्रा !!!!!!!!!!!
अरविंद मिश्रा !!!!!!!!!!!
सोमवार, 25 जून 2007
लडकी बिना लाइफ सूनी -पार्ट -1
अपनी लाइफ graduation के पहले तक बड़ी सूनी-सूनी थी। क्योंकि पहले boys कालेज में पड़ते थे, लड़कियों से दोस्ती करना तो दूर , बात करने पर भी पर सीबीआई कि तरह घरवालों कि नज़र रहती थी . खासकर छोटे भाई की, वोह तो अब्बा जान का पक्का खबरी था। उससे हमेशा मेरी फटती थी। अन्दर कुंठा के शिकार हो रहे थे। जब युनिवर्सिटी पहुचे तो देखा कि खूबसूरत और सेक्सी लडकियां कसी जीन्स पहने लड़को के साथ घूम रही हैं. कुछ लड़के तो उनके साथ घूमना deserve करते थे पर कुछ तो साले सिगरेट पीते और पाजामे से भी ठीली जीन्स पहने चूतिये लग रहे थे। उनको देखकर अन्दर से आवाज़ आती थी कि साला हममें क्या कमी है। पर अगर कमी नही है तो......frastated क्यों....? निष्कर्ष निकला गया कि अब लडकिया सीदे- सादे रहने से पटने वाली नही हैं.....अब हम भी धुएं का छल्ला उदायेंगे ...........................बाकी कल.....
अरविंद मिश्रा
अरविंद मिश्रा
भैंस के ऊपर मैं , मेरे ऊपर बाईक
आज के युवा बाईक ऐसे चलते हैं जैसे हवाई जहाज , उन्हें बाईक भी घर में आसानी से मिल जाते हैं, लेकिन जब मैं १३ साल का था, तब बाईक एक सपने कि तरह था । जब भी मैं किसी को बाके चलते देखता तो मन करता कि मैं भी पंख लगा कर बाईक पर उरुं और मस्ती करूं । मेरे घर में स्कूटर था, जिसे मैं गाहे-बघाहे निकल लेटा और अपने दोस्तों को कहता कि उसे धकेलो , मुझे चलाना नहीं आता था । मेरे मामा के पास बाईक था, एक दिन वी अपने दोस्त के साथ आये थे, मामा खाना खाने लगे तो मैं उनके दोस्त को बोला कि मुझे बाईक चलाना सिखा दें । उन्होने मुझे बाईक के बारे में समझाया और मुझे बाईक दे कर खुद पिछे बैठ गए धीरे-धीरे मैं आगे बढ़ा । कुछ दूर तक मैंने ठीक बाईक चलाया, फिर सामने एक ट्रक आ रहा था , उसे देखते ही मैंने बाईक को साइड किया बगल में एक भैंस खरी थी , हम दोनो भैस के ऊपर गिरे । हम दोनो के भार से भैंस गिर गयी, भैस के ऊपर मैं और मेरे ऊपर भैंस के ऊपर मैं , मेरे ऊपर बाईक मजेदार लग रही थी, कुछ लोगो ने हमे उठाया। मुझे कोई खास चोट नही आयी थी लेकिन मामा के दोस्त को काफी चोट आयी, घर आकार मैंने किसी को नही बताया, उस दिन के बाद मैंने बाईक चलाना सिख लिया।
रविवार, 24 जून 2007
वो कालेज की मस्ती
कैम्पस यानी जिंदगी के कुछ aese पल जिसे मेरी समझ से सबने खूब जिया होगा। फिर हम भी इस मौज मस्ती भरे दिन mein कैसे पीछे रह सकते थे. शुरुआत से ही मैं थोडा शेतान टाईप की थी. बचपन मे school से लेकर बडे होने पर कालेज तक अपनी शेतानियो का ख़ूब परचम lahraayaa है। भगवान् कि दया से सहेलिया भी कुछ इसी तरह मिली। हमने क्लास ८ से ही skool बंक करना शुरू कर दिया था। पर उस समय हम कही और नही बल्कि अपनी सहेली के ही घर जा कर पूरा दिन ऎन्जॉय करते थे। और जब कालेज गए तो वहा महेने मे एक बार फिल्म देखना, चुपके से किसी दोस्त के जन्मदिन par किसी रेस्तुरांत मे जाना . एक तरह से जिंदगी का फुल मजा हमने उन दिनों लिया। कालेज मे मेरे साथ एक bhyankar vakayaa हुआ था क्या था vo..................... chaliye फिर कभी।
Pushpa शर्मा
Pushpa शर्मा
शनिवार, 23 जून 2007
बच्चों के कुंदन भैया
एक हैं हमारे कुंदन जीं. मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं. प्रभात खबर में इनका साथ मिला, जो आज तक है. फिहाल वोह वहाँ बच्चों का पन्ना और फिल्म का पन्ना देख रहे हैं. हालांकि दोनो बिलकूल अलग-अलग चीजें हैं, लेकिन कुंदन एक अच्छे मेनेजर भी हैं. बचेन उन्हें कुंदन भैया जे नाम से बुलाते हैं. उनकी कैम्पस की यादें।
सौरभ, अनेक ब्लॉग में जाता हूँ और कभी-कभी पढता भी हूँ, लेकिन तुम्हारा ब्लॉग कुछ हट कर लगा, क्योंकि इसमे जाने से काम्पुस के बेताक्लुफ दिनों कि सुनहरी याद या गयी. सच जीवन का सबसे रोमांचक और सुनहरा दिन कालेज के ही था. ढेरों सुनहरी यादें काम्पुस से जूरी है. एक रोमांचक वाकिये तुम्हे बताता हूँ. उस समय मैं बीआस्सी पार्ट-१ में था. हमारे कालेज में जूलोजी के कम थे, इस्लिया दो पग स्चोलुर को भेजा गया था. उस दिन मोर्निंग में पहला क्लास होने के बाद प्रक्टिकल था. क्लास छोर कर मैं पास में ही स्थित सुजाता सिनेमा हॉल चला गया (मुझे फिल्म देखने का बहुत शौक था, शायद उसी कारन आज फिल्मो पर लिखता हूँ) वहाँ मैं लाईंन में खरा हुआ, कुछ देर बाद मैंने देखा कि मेरे नए लक्चेर थीं. लड़के आगे खरे हैं. उन्हें वहाँ देख कर मैं सन् रह गया. उन्हें देख कर लगा श्हयद उनहोंने मुझे देख लिया हैं. उन्हें दीसे का टिकट लेते देख कर मैंने बल्कोनी का टिकट लिया, किसी तरह मैंने फिल्म देखी और सिनेमा ख़त्म होने के १० मिनट पहले ही मैं हॉल से बहार निकलने लगा, जैसे ही कॉरिडोर मैं पहुँचा सामने से जल्दी-जल्दी आते lएअक्चार भी दिखाई दिए, हम दोनो कि नजरें मिली, मैंने अपनी नजर नीचे kee और जल्दी से बहार निकल गया. दुसरे दिन क्लास में मुझे संकोच लग रह था, लेकिन सिर पहले कि तरह ही मुझे मुस्कुरा कर देखा. आज जब भी सुजाता हॉल जाता हूँ तो अनायास मुस्कुरा देता हूँ.आगे और बातें होंगी.
कुंदन कुमार चौधरी
सौरभ, अनेक ब्लॉग में जाता हूँ और कभी-कभी पढता भी हूँ, लेकिन तुम्हारा ब्लॉग कुछ हट कर लगा, क्योंकि इसमे जाने से काम्पुस के बेताक्लुफ दिनों कि सुनहरी याद या गयी. सच जीवन का सबसे रोमांचक और सुनहरा दिन कालेज के ही था. ढेरों सुनहरी यादें काम्पुस से जूरी है. एक रोमांचक वाकिये तुम्हे बताता हूँ. उस समय मैं बीआस्सी पार्ट-१ में था. हमारे कालेज में जूलोजी के कम थे, इस्लिया दो पग स्चोलुर को भेजा गया था. उस दिन मोर्निंग में पहला क्लास होने के बाद प्रक्टिकल था. क्लास छोर कर मैं पास में ही स्थित सुजाता सिनेमा हॉल चला गया (मुझे फिल्म देखने का बहुत शौक था, शायद उसी कारन आज फिल्मो पर लिखता हूँ) वहाँ मैं लाईंन में खरा हुआ, कुछ देर बाद मैंने देखा कि मेरे नए लक्चेर थीं. लड़के आगे खरे हैं. उन्हें वहाँ देख कर मैं सन् रह गया. उन्हें देख कर लगा श्हयद उनहोंने मुझे देख लिया हैं. उन्हें दीसे का टिकट लेते देख कर मैंने बल्कोनी का टिकट लिया, किसी तरह मैंने फिल्म देखी और सिनेमा ख़त्म होने के १० मिनट पहले ही मैं हॉल से बहार निकलने लगा, जैसे ही कॉरिडोर मैं पहुँचा सामने से जल्दी-जल्दी आते lएअक्चार भी दिखाई दिए, हम दोनो कि नजरें मिली, मैंने अपनी नजर नीचे kee और जल्दी से बहार निकल गया. दुसरे दिन क्लास में मुझे संकोच लग रह था, लेकिन सिर पहले कि तरह ही मुझे मुस्कुरा कर देखा. आज जब भी सुजाता हॉल जाता हूँ तो अनायास मुस्कुरा देता हूँ.आगे और बातें होंगी.
कुंदन कुमार चौधरी
सदस्यता लें
संदेश (Atom)