मोहाली में फरेवेल पार्टी के दौरान हिंदुस्तान चंडीगढ़ की टीम।बुधवार, 7 जनवरी 2009
मंगलवार, 19 अगस्त 2008
आज दुआ कीजिए
बीजिंग ओलंपिक में आज विजेंद्र और जीतेंद्र क्वार्टर फाइनल मुकाबले में क्रमशः इक्वाडोर के कार्लोस गोजोरा और रूस के जेओर्जी बालिक्शन से भिड़ेंगे। भिवानी के इन दोनों रणबांकुरों के लिए आज की जीत ही पदक का सपना साकार कर सकती है। इसलिए इनके लिए दुआ की जानी चाहिए। जितेंद्र का मैच शाम ०४ बजकर ४६ मिनट पर और विजेंद्र का मैच शाम ६ बजकर १६ मिनट पर होगा।
रविवार, 15 जून 2008
मृणाल पांडेय जी के साथ एक दिन

शायद ही मैं इस दिन को भूल पाऊं, क्योंकि इस दिन हिन्दुस्तान की प्रधान संपादक मृणाल पांडेय जी के साथ हमलोगों को काफी समय बिताने का अवसर मिला। केवल इसलिए यह यादगार नहीं था, क्योंकि वह हिन्दुस्तान की प्रधान संपादक हैं, बलि्क इसलिए क्योंकि एक शखि्सयत और लेखिका के रूप में मैं उन्हें बरसों से पढ़ते भी आ रहा था। पहली बार जब उनसे दिल्ली में मुलाकात हुई थी, तो उनसे प्रभावित हुए बिना नही रही सका। अब तक लोगों को कहते सुना था और जब सामने मुलाकात हुई, तो महसूस भी किया कि लोग सही कहते थे। पहली बार मिलने के बाद से ही मेरी इच्छा थी कि मैं उनके साथ समय बिताऊं। वह समय भी जल्दी ही मिल गया। शनिवार को वह चंडीगढ़ में थीं। शाम करीब ४ बजे वह मोहाली में हिन्दुस्तान टाइम्स के ऑफिस पहुंची। मीटिंग में उन्होंने जिस सरलता से अपनी बातें रखीं और जिस मजबूती से अपने सुझाव दिए, उससे लग रहा था कि उनके सुझाव पर अभी से ही अमल कर दिया जाए। भविष्य में एचटी मीडिया की योजनाएं और वतॆमान में मीडिया के स्वरूप पर चचाॆ के बाद उन्होंने सभी से कहा कि अगर आपकी कुछ समस्याएं हों, तो हमें बताएं। कांफ्रेंस रूम से बाहर हमलोग अपने सेक्शन में पहुंचें, तो मृणाल जी ने सभी को अपने सिग्नेचर वाली डायरी भेंट की। रात में मृणाल जी के साथ ही लेकव्यू क्लब में शानदार पाटीॆ और कायॆक्रम का भी आयोजन था। संपादक अकू श्रीवास्तव जी ने पहले ही हम सभी से कह दिया था कि एडिशन ९ बजे तक छोड़ देना है। ऐसा हुआ भी। ९ बजे ही एडिशन छूटने के कारण संपादक जी ने कहा भी कि मतलब आप सब समय पर एडिशन छोड़ सकते हो, तो फिर और दिन लेट क्यों होते हो? वहां से सीधे हम लोग लेकव्यू क्लब पहुंचे। डीजे के साथ ही जैसा कि हर बड़े क्लबों में होता है, वेज-नॉनवेज की पूरी वैराइटी थी। पीने वालों के लिए भी पूरी व्यवस्था थी। मृणाल जी वहां मौजूद थीं। डीजे की धुन पर हम सभी के साथ मृणाल जी ने भी डांस किया। ११ बजे पाटीॆ अपने शबाब पर थी। केक कट चुके थे और सभी को गिफ्ट भी मिल चुका था। लाइट्स और म्यूजिक ऑफ होने के बाद कैंडल लाइट जलाई गई। हिन्दुस्तान टीम के कलाकार सहकर्मियों ने अपनी-अपनी कलाओं के नमूने पेश किए। कायॆक्रम की एंकरिंग की कमान मेरे हाथ थी। सो मेरे पास बेहतर मौका था अपनी कविताएं सुनाने का। बीच-बीच में मैंने कुछ कविताएं भी सुनाईं। कायॆक्रम ठहाकों और चूटीली प्रतिक्रियाओं के बीच रंग में था। इसके बाद खाने का दौर शुरू हुआ। तब तक रात के एक बजे चुके थे। मृणाल जी ने हम सब से विदा लीं और बेस्ट ऑफ लक कह कर चली गईं। इसके बाद धीरे-धीरे सभी लोग निकलते गए। हालांकि कुछ पीने-पिलाने वाले साथी कितनी देर रुकें, यह पता नहीं, क्योंकि अगले दिन ४ लोग छुट्टी पर थे। अगली पोस्ट में पढ़ें हमारे संपादक अकु श्रीवास्तव जी के बारे में।
गुरुवार, 12 जून 2008
हमारे कन्हैया जी (२)
विश्वस्त सूत्रों से मालूम हुआ है कि कन्हैया जी इन दिनों गोरा बनने के लिए तन-मन-धन से जुटे हैं। टीवी पर जितने भी तरह के फेयरनेस क्रीम के विग्यापन आते हैं, वह सब उनके घर में और ऑफिस में उनके ड्रावर में देखे जा सकते हैं। हालांकि फेयरनेस क्रीम का यूज करना उनके लिए कोई नई बात नहीं है, इसके पहले भी वह क्रीम यूज करते रहे हैं, लेकिन पहले मांग कर काम चलाते थे। बाद में जिनसे मांगा करते थे, उन्होंने लाना छो़ड़ दिया, क्योंकि उनके क्रीम की खपत तो बढ़ी ही थी, साथ ही अपनी क्रीम पर से उनका भरोसा भी उठने लगा था। फिर किसी ने सलाह दी कि खुद से खरीद कर क्रीम लगाने से ही क्रीम का असर आता है, सो वह तुरंत मॉल पहुंच गए और क्रीम ले आए। सुबह, दोपहर, शाम और रात सभी समय के लिए उनके पास अलग-अलग क्रीम है, जो वह लगाते हैं। शायद उनका विश्लास है कि कोई तो असर करेगी। ये गोरा बनने का भूत उन पर किस तरह सवार हुआ, इसकी जांच की तो पता चला कि हाल ही में उनके पड़ोस में तीन लड़कियां आई हैं, उन्हें ही रिझाने के लिए वह क्रीम का यूज कर रहे हैं। उनका नाम पता न होने के कारण कन्हैया जी ने उन्हें नंबर दे दिया है। नंबर १, नंबर २, नंबर ३। कंप्यूटर को भी उन्होंने घर पर इस तरह रखा है कि पड़ोसी की खिड़की कंप्यूटर चेयर पर बैठने से सामने दिखे। कंप्यूटर पर भी उन्हें मेरे सामने वाली खिड़की में...गाना सुनना आजकल खूब पसंद आ रहा है। कल तक कन्हैया जी कहते थे कि जिंदगी में कुछ नहीं रखा है, लेकिन आजकल वह अपने दोस्तों से कहते हैं कि जिंदगी में काफी रंग है, बस नजर का फेर है।
गुरुवार, 5 जून 2008
हमारे कन्हैया जी
एक हैं हमारे कन्हैया जी। कन्हैया जी जैसे शखि्सयत आजकल लुप्तप्राय हैं। मेरी खुशनसीबी (?) कि मुझे उनके साथ दो संस्थानों में काम करने का मौका मिला। एक प्रभात खबर दिल्ली और दूसरा आई-नेक्स्ट कानपुर। कन्हैया जी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह बहुत कूल हैं। अखबार के दफ्तरों में जहां पन्ने छोड़ने के समय काफी अफरा-तफरी का माहौल होता है। कन्हैया जी को मैने हमेशा कूल देखा है। उन्हें गुस्सा भी आता है तो उससे वह अपने ही तरीके से निपटते हैं। बिल्कुल मस्त और अजब-गजब चीजों के शौकीन। एक बार उन्हें पैसों की सख्त जरूरत थी। कहीं से उन्होंने २००० रुपए जुगाड़ किए और उसी दिन ९०० रुपए का चश्मा ले आए। वैसे मैंने कभी उन्हें चश्मा लगाते नहीं देखा। कानपुर में तो कभी मौका नहीं मिला, लेकिन दिल्ली में उनके हाथों का खाना जरूर खाया था। मिक्स वेजिटेबल मैंने जैसा उनके हाथों का खाया है, वैसा कभी नहीं खाया। अंदर से बेहद सीधे, लेकिन ऊपर से उतने ही सख्त और प्रोफेशनल दिखने वाले कन्हैया जी को काम के बीच में मुंगफली खाने का अजीब शौक है। अक्सर पेज देखते वक्त जब उनकी जरूरत होती और पता करता तो पता चलता कि वह तो नीचे गए हैं मुंगफली खाने। अकेले खाना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। हालांकि अगर कोई दूसरा खचॆ करे, तो वह दो-तीन लोगों के साथ भी खा लेते हैं। पार्टी से परहेज करते हैं। एक बार बड़ी मुशि्कल से उनका फरजी बथॆडे हमलोगों ने मनाया तो उन्होंने खचॆ किया था। अपने में मस्त इतना रहते हैं कि शायद ही कभी अपने दोस्तों को भी याद किया होगा। कोई फोन नहीं, कोई मेल नहीं। खाली समय में इंटरनेट पर नई-नई चीजें ढूंढ़ना उन्हें अच्छा लगता है। शादी हो गई है, दो बच्चे भी हैं, लेकिन अभी भी उनके इनबॉक्स में मेट्रीमोनियल साइट से ढेरों ऑफर पड़े हैं। फुसॆत के लम्हों में उन प्रोफाइल को चेक करते हुए भी उन्हें अक्सर काम खत्म होने के बाद देखा जा सकता है। इनकी एक और खासियत यह है कि बच्चों की तरह अगर इन्हें चिढा़या जाए, तो बहुत जल्दी चिढ़ जाते हैं। मैं अक्सर उन्हें चिढाया करता था और फिर मैं और रंधीर उनकी बातों के मजे लिया करते थे। वैसे व्यक्तिगत जीवन में कई मामलों में वह रंधीर से सलाह करने के बाद ही कोई कदम उठाते हैं। कन्हैया जी उन चुनिंदा लोगों में से हैं, जो खुद ही सीखने का जज्बा रखते हैं और खुद ही कई नई चीजें कि्रएट भी करते हैं। डिजाइनिंग बहुत अच्छी करते हैं। हां, नई डिजाइनों के लिए जब तक उन्हें प्रेरित न किया जाए, वह पुराने से ही काम चलाते हैं। उनके साथ काम करते हुए कई बार तो मुझे ऐसा भी लगा कि कन्हैया जी अपनी योग्यता का महज ३०-४० फीसदी ही देते हैं। अगर उन्हें प्रेरणा मिले, तो मुझे कोई शक नहीं कि वह बहुत अच्छा कर सकते हैं, शायद सबसे अच्छा।
शुक्रवार, 30 मई 2008
...और मैं पास हो गया
नीचे जाकर मैंने दौड़कर पेपर उठाया। पहले पेज पर अंदर के पेज पर आनेवाले रिजल्ट का उल्लेख था। मैंने तुरंत वह पन्ना पलटा। और जल्दी-जल्दी अपने स्कूल का नाम ढूंढ़ने लगा। वहां किसी स्कूल का नाम नहीं था। असल में रिजल्ट स्कूल कोड के आधार पर दिया गया था। कोड मुझे याद नहीं था। मैं दौड़कर एडमिट काडॆ ढूंढ़ने गया। तब तक लैंडलाइन पर मेरे मित्र अमित का फोन आ गया। उसने बताया कि मैं सेकेंड डिविजन से पास हो गया। फिर भी मुझे तसल्ली नहीं थी। मैंने खुद से रिजल्ट देखा। पहली बार संतुषि्ट हुई कि चलो फेल नहीं हुआ, लेकिन यह मानव स्वभाव के अनुरूप तुरंत यह सोचकर असंतुष्ट हो गया कि मेरा फस्टॆ डिविजन नहीं आया। शायद फस्टॆ आता तो टॉपर होने के बारे में सोचता। बहरहाल मैं पास हो चुका था और महज ३ अंकों से मेरा फस्टॆ डिविजन छूटा था। अब बारी थी सपने बुनने की। एडमिशन के पहले कभी आईएएस, कभी किसी बड़ी कंपनी का मैनेजर तो कभी खुद को आईपीएस को रूप में सोचना तब बड़ा अच्छा लगता था। तब यह ऐसा बिल्कुल भी नहीं सोचा था कि पत्रकार बनूंगा। हर सोच में सिफॆ और सिफॆ पॉजिटिव चीजें। कभी यह नहीं सोचा कि वहां तक पहुंचने में किन मुशि्कल रास्तों से होकर गुजरना पड़ेगा। सब कुछ बहुत आसान लगता था। ऐसा लगता था, जैसे मैंने जो सोचा वह मुझे मिल गया। बस मुझे सोचना सही तरीके से था। वाकई सुखद अनुभव था। पत्रकारिता मेरा शौक था और मैं उसे शौक तक ही रखना चाहता था, क्योंकि शौक जब प्रोफेशन बन जाता है, तो वह शौक नहीं रह जाता। बहरहाल, किसी अच्छे बड़े कॉलेज में दाखिला लेने का मन बनाया, जो पूरा न हो सका। प्लस टू कॉमसॆ से करने के बाद मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़कर उस इच्छा को पूरा किया।
मंगलवार, 27 मई 2008
वो दसवीं के रिजल्ट का इंतज़ार
आज सीबीएसई दसवीं का रिजल्ट आ रहा है। आज जब रिजल्ट को लेकर कल की प्लानिंग कर रहा था, तो मुझे वह दिन याद आ गया, जब मुझे अपने बोडॆ के रिजल्ट का इंतजार था। एग्जाम के बाद रिजल्ट आने तक करीब एक महीने का समय था। इस दौरान बेहतर रिजल्ट के लिए एग्जाम में लिखे गए सवालों के जवाब का आकलन करने के बजाय मैं पूजा और मंदिरों पर ज्यादा ध्यान देने लगा था। रांची का शायद ही कोई मंदिर बचा हो, जहां मैंने पूजा-अचॆना न की हो। वह १९९५ का समय था और उस साल नया सिलेबस इंट्रोड्यूज हुआ था। इसलिए डर ज्यादा था। रिजल्ट का दिन मुझे आज भी याद है। रात भर मुझे नींद नहीं आई, क्योंकि अगले दिन मेरे भविष्य का फैसला होना था। वैसे मैं इस बात को लेकर कम परेशान था कि रिजल्ट खराब होने पर मेरा भविष्य कैसा होगा, इस बात को लेकर ज्यादा परेशान था कि अगर फेल हो गया तो मेरे साथी मुझे क्या कहेंगे। इसकी वजह यह थी कि १५०० बच्चों के उस मिशनरी स्कूल का न केवल मैं स्कूल लीडर था, बलि्क कई तरह के कार्यक्रमों मैं स्कूल का प्रतिनिधित्व कर चुका था। टीचसॆ का भी मैं प्यारा था। इतना प्यारा कि एक बार जब मैं बीमार पड़ा तो स्कूल के तकरीबन सभी टीचसॆ छुट्टी के बाद मेरा हालचाल लेने मेरे पहुंच गए थे। उनके प्यार से मैं अभिभुत था। मैं उन्हें किसी भी तरह निराश नहीं करना चाहता था। रात में ही मैने प्लानिंग कर ली थी कि अगर फेल हो गया, तो मुझे क्या करना है। इसलिए मैं निशि्चंत था। फिर भी रात भर दिमाग में कई तरह की सीन घूम रही थी। कभी लग रहा था कि मैं टॉप कर गया हूं और सभी मुझे बधाई दे रहे हैं। कभी लगता कि मैं फेल हो गया हूं और लड़के मुझसे कह रहे हैं कि हो गई तुम्हारी लीडरई खत्म। कब नींद ने मुझे अपने आगोश में ले लिया, मुझे पता ही नहीं चला। सपने में फिर वही सब बातें। नींद खुली तो देखा अभी तो सुबह के चार ही बज रहे हैं। उसके बाद इधर-उधर अपने कमरे में ही टहलता रहा। मैं घर के लोगों को भी यह एहसास नहीं दिलाना चाहता था कि मैं रिजल्ट को लेकर परेशान हूं। बहरहाल, किसी तरह ६ भी बज गए और न्यूजपेपर फेंकने की आवाज सुनाई दी। मैं दौड़कर नीचे गया....शेष अगले पोस्ट में.
सोमवार, 26 मई 2008
अनिल सिन्हा जीः जाना एक सोच का
दोपहर एक बजे घर से ऑफिस के लिए निकला ही था कि कानपुर आई-नेक्स्ट के एक साथी का फोन आया कि अनिल सिन्हा नहीं रहे। मैं अवाक था, मुझे ऐसी खबर की उम्मीद नहीं थी। लगा जैसे कल की ही तो बात थी, जब मैं उनसे मिला था। अनिल सिन्हा जी को मैं मार्केटिंग कम्युनिकेशन हेड या डिजाइनर नहीं मानता था। मैं उन्हें एक सोच मानता था। एक ऐसी जिंदादिल सोच जो आज की जरूरत है। पहली बार उनसे मेरा सामना दिसंबर २००७ में हुआ था। मैं उसे किसी पेज की डिजाइनिंग के विषय पर बात करने गया था। हालांकि तब मैं उन्हें अच्छी तरह जानता भी नहीं था, लेकिन जल्द ही उन्हें करीब से जानने का मौका मिला। अगस्त २००७ में कानपुर के नए ऑफिस में उनकी सीट बिल्कुल सामने थी। अक्सर कैफेटेरिया जाते वक्त उनके डेस्क से ही गुजरता था। शायद ही कोई ऐसा दिन रहा हो, जब उन्होंने मेरे साथ कोई नया आइडिया या कोई नया कंसेप्ट शेयर न किया हो। उम्र में मुझसे काफी बड़े थे, लेकिन जब मुझसे बातें करते तो २८ साल के जवान बन जाते थे। उनका व्यकि्त्तव ऐसा था कि ऑफिस का कोई भी सहयोगी उनसे किसी भी तरह की बातें कर लेता था। बेहद मजाकिया किस्म के इंसान और तुरंत सटीक टिप्पणी करने की उनकी आदत से कई बार हम सब अवाक रह जाते थे। उनके पास वाकई आइडियाज की खान होती थी। हमेशा नए प्रयोग करना उन्हें अच्छा लगता था। उनसे जुड़े लोग आज भी मानते हैं कि जिस पेज पर उनका हाथ लग जाता था, उसकी खूबसूरती बढ़ जाती थी। कभी-कभी मैं उनसे कहता था कि सर आपकी सोच समय से काफी आगे है। आप २०२० के रीडसॆ को ध्यान में रखते हैं। तब वह कहते थे कि समय से हमेशा आगे ही सोचना चाहिए। इतना सब कुछ होते हुए भी काम के परफेक्शन के मामले में वह कोई कोताही नहीं बरतते थे। ले-आउट और डिजाइनिंग में एक एमएम के मिस्टेक को भी वह तुरंत पकड़ लेते थे। उनके पास बैठने का मतलब था कि आप कुछ सीखेंगे ही। एक साल पहले उनके साथ कानपुर से लखनऊ जा रहा था। रास्ते में उनसे कुछ इधर-उधर की बातें, कुछ फैमिली की बातें और प्रोफेशनल करियर की बातों के अलावा उन्हें मुझे रंगों के प्रयोग के बारे में भी काफी बातें बताईं। उन्होंने मुझसे यह भी कहा कि जरूरत पड़े तो मुझे फोन कर लेना। अंग्रेजी बैंड के बारे में उन्हें जितनी जानकारी थी, उतनी ही जानकारी हिन्दी गानों की भी थी। वह मुझसे कहा करते थे कि दुनिया की कोई चीज ऐसी नहीं है, जो इंटरनेट पर न मिले। फीचर के पन्नों से उनका खास लगाव था। उनके सहयोग से तब हमलोगों ने आई-नेकेस्ट के लिए कई विशेष पुलआउट भी निकाले थे। मुझे याद है उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि सौरभ जहां भी रहो, वहां के लिए इतना और ऐसा काम करने की कोशिश करो, कि तुम्हें हमेशा याद रखा जाए। आज वाकई उनका जाना दिल को काफी दुखी कर गया। बार-बार उनकी हंसी, उनका मजाक और हर दिन सुबह यह कहना कि सौरभ आज पाटीॆ का क्या प्रोग्राम है, दिमाग में गूंज रहा हो। कानपुर से बहुत दूर हूं, लेकिन महसूस कर रहा हूं कि कैसे उनका कंप्यूटर और उनकी कुसीॆ खाली होगी। मुझे ही नहीं, सभी को बहुत याद आएंगे अनिल सिन्हा जी।
रिश्तों को भरपूर जिएं
एक बार फिर यह कहानी भी मानवीय संवेदनाओं के हत्या की कहानी थी। एक भरोसा को तोड़ने का सिलसिला था। पिछले दिनों नोएडा के आरुषि मामले में बाप पर कत्ल का आरोप और सिटी ब्यूटीफुल (चंडीगढ़) में अनुराधा हत्याकांड में पति बलिजंदर पर पत्नी अनुराधा को मारने का आरोप। दोनों ही मामलों में काफी समानता है। दोनों ही हत्याकांड में अपनों ने हत्या की। ये इतने अपने थे कि कत्ल से पहले दोनों ही मामले में कभी किसी ने सोचा भी न होगा, ऐसा हो सकता है। महिलाएं आज सेफ नहीं है, उनके लिए चारों तरफ खतरा ही है, जैसी बातें कर भले ही हम इस मामले पर आगे बात करने की जहमत न उठाएं, लेकिन इस सच्चाई से भी हम किनारा नहीं कर सकते कि दोनों ही मामलों में हत्या का कारण भी महिलाएं थी। अनुराधा हत्याकांड में पति बलिजंदर का नूर नाम की मॉडल से संबंध थे और वह उससे शादी करना चाहता था, तो आरुषि हत्याकांड में हत्यारे डॉक्टर के किसी महिला से अवैध संबंध थे। मामला यहां महिलाओं की सेफ्टी का नहीं है। यह मामला है तेजी से बदलती हमारी लाइफस्टाइल का, हमारी असि्थरता का और सब कुछ पा लेने के लिए कुछ भी कर गुजरने की जिद का। इस पूरे मामले में हमने जो सबसे बड़ी और महत्वपूणॆ चीज खोई है वह है विश्वास और रिश्ते। इन दोनों की अहमियत आज हमारे लिए खत्म होती लग रही हैं। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है, जब हमारे सामने कोई परेशानी होती है या हम किसी समस्या में होते हैं, तो सबसे पहले हमें अपनों की ही याद आती है। कहीं ऐसा न हो कि इस अंधी दौड़ में हम भी शामिल हो जाएं और फिर जरूरत पड़ने पर जब हम अपनों को आवाज लगाएं, तो दूर-दूर तक कहीं रोशनी की एक किरण तक नजर न आए। उस वक्त के इंतजार से बेहतर है हम संभल जाएं और उन रिश्तों को भरपूर जिएं, जो ईश्वर ने हमारे लिए या हमने दिल से बनाए हैं।
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